
टीबी भारत में आज भी आम है — और यह पूरी तरह ठीक हो सकती है, बशर्ते सही जाँच हो, सही दवाएँ चलें और पूरा कोर्स पूरा हो। डॉ. अजीत यादव (एमडी, डीएनबी, एमएनएएमएस) क्षय रोग एवं श्वसन रोगों के विशेषज्ञ हैं।
टीबी क्या है
यह माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस नामक धीमी गति से बढ़ने वाले जीवाणु से होती है, जो सक्रिय फेफड़ा-टीबी वाले व्यक्ति के खाँसने या छींकने से हवा द्वारा फैलती है। यह अधिकतर फेफड़ों को प्रभावित करती है, पर लिम्फ नोड, प्लूरा, हड्डी व रीढ़, पेट और मस्तिष्क को भी हो सकती है।
संक्रमण का अर्थ हमेशा बीमारी नहीं। अधिकांश लोगों में जीवाणु सुप्त पड़ा रहता है — इसे लेटेंट टीबी कहते हैं, जिसमें कोई लक्षण नहीं होते और यह फैलती भी नहीं। प्रतिरोधक क्षमता घटने पर (मधुमेह, एचआईवी, कुपोषण, स्टेरॉयड, बढ़ती आयु) यह सक्रिय हो सकती है।
लक्षण
दो सप्ताह से अधिक खाँसी; खाँसी में खून; हल्का बुखार, विशेषकर शाम को; रात में अधिक पसीना; भूख और वज़न घटना; थकान; छाती में दर्द।
फेफड़ों के बाहर की टीबी में — गर्दन में बिना दर्द की गाँठ, प्लूरा प्रभावित होने पर साँस फूलना, रीढ़ की टीबी में लगातार कमर दर्द, पेट में दर्द व सूजन, मस्तिष्क की टीबी में सिरदर्द और भ्रम।
भारत में दो सप्ताह से अधिक चलने वाली किसी भी खाँसी में टीबी की जाँच अवश्य होनी चाहिए।
जाँच
- बलगम की जाँच — कम से कम दो नमूने।
- रैपिड मॉलिक्युलर टेस्ट (CBNAAT/TrueNat) आज का मानक है — यह कुछ घंटों में टीबी बताता है और साथ ही रिफ़ैम्पिसिन प्रतिरोध भी पहचानता है।
- छाती का एक्स-रे, आवश्यक होने पर सीटी।
- बलगम न बन पाने या बार-बार निगेटिव आने पर ब्रोंकोस्कोपी से सीधे नमूना।
- प्लूरा की टीबी के लिए मेडिकल थोरैकोस्कोपी, जिसकी सफलता दर बहुत अधिक है।
- कल्चर एवं दवा संवेदनशीलता जाँच, तथा हर मरीज़ में मधुमेह व एचआईवी की जाँच।
उपचार
उपचार राष्ट्रीय कार्यक्रम के अनुसार होता है। दवा-संवेदनशील टीबी में दो चरण — दो महीने चार दवाओं का सघन चरण, फिर निरंतरता चरण, कुल मिलाकर प्रायः छह महीने। हड्डी, रीढ़ या मस्तिष्क की टीबी में अवधि अधिक होती है।
दवा-प्रतिरोधी टीबी में विशेष, लंबा कोर्स चलता है। नई मुँह से ली जाने वाली दवाओं से परिणाम काफ़ी बेहतर हुए हैं।
साथ में — साइड इफ़ेक्ट का प्रबंधन (मिचली, लीवर एंजाइम बढ़ना, जोड़ों में दर्द, हाथ-पैर में झुनझुनी, आँखों पर असर) — इनके कारण दवा बंद करना विफलता और प्रतिरोध का बड़ा कारण है; प्रगति की निगरानी; पोषण सहायता; मधुमेह पर नियंत्रण; परिवार के सदस्यों की जाँच; तथा शुरुआती हफ़्तों में संक्रमण से बचाव के उपाय।
पूरा कोर्स पूरा करना ही इलाज है। लक्षण ठीक होते ही दवा रोक देना दोबारा बीमारी और दवा-प्रतिरोधी टीबी का सबसे बड़ा कारण है।
इलाज के बाद
कुछ मरीज़ों में ठीक होने के बाद भी निशान, ब्रोंकिएक्टेसिस या फेफड़ों की क्षमता में कमी रह जाती है। कोर्स पूरा होने के बाद भी खाँसी या साँस फूलना बना रहे तो जाँच आवश्यक है — "पोस्ट-टीबी लंग डिज़ीज़" आम है और इसका इलाज संभव है।
कब मिलें
दो सप्ताह से अधिक खाँसी, खाँसी में खून, शाम का बुखार व रात में पसीना, टीबी मरीज़ के निकट संपर्क, दवा सहन न होने, या कोर्स के बाद लक्षण बने रहने पर — अपॉइंटमेंट बुक करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या टीबी पूरी तरह ठीक हो जाती है?
हाँ। दवा-संवेदनशील टीबी पूरा कोर्स करने वाले अधिकांश मरीज़ों में पूरी तरह ठीक हो जाती है। दवा-प्रतिरोधी टीबी भी ठीक होती है, पर उसमें लंबा और विशेष कोर्स लगता है। सबसे बड़ा ख़तरा बीच में दवा छोड़ देना है।
कोर्स कितने दिन का है, क्या आराम मिलने पर दवा बंद कर दें?
फेफड़ों की टीबी में प्रायः छह महीने; हड्डी, रीढ़ या मस्तिष्क की टीबी में अधिक। कुछ हफ़्तों में काफ़ी आराम मिल जाता है, पर तब तक जीवाणु समाप्त नहीं होते। बीच में दवा रोकना दोबारा बीमारी और प्रतिरोध का प्रमुख कारण है।
क्या मुझसे दूसरों को टीबी फैल सकती है?
सक्रिय फेफड़ा-टीबी में मुख्यतः इलाज शुरू होने से पहले और शुरुआती हफ़्तों में। प्रभावी दवा शुरू होते ही संक्रामकता तेज़ी से घटती है — प्रायः दो-तीन सप्ताह में। हवादार कमरा, खाँसते समय मुँह ढकना और शुरुआत में अलग सोना उचित है। लेटेंट टीबी बिल्कुल नहीं फैलती।
बलगम की जाँच निगेटिव है पर डॉक्टर को टीबी का शक है — क्यों?
बलगम की साधारण जाँच कई मामलों में टीबी नहीं पकड़ पाती। मॉलिक्युलर टेस्ट अधिक संवेदनशील है। शक बना रहने पर ब्रोंकोस्कोपी से सीधे नमूना लिया जाता है और प्लूरा की बीमारी में थोरैकोस्कोपी की जाती है।
दवा से पेट या लीवर पर असर हो रहा है, क्या करूँ?
साइड इफ़ेक्ट सामान्य हैं और इन्हें सँभाला जाता है, न कि दवा बंद करने का कारण माना जाता है। समय बदलने, सहायक दवा देने या अस्थायी रूप से कोर्स समायोजित करने से इलाज जारी रह पाता है। स्वयं दवा बंद न करें — पहले दिखाएँ।

