
ILD कोई एक बीमारी नहीं, बल्कि सौ से अधिक बीमारियों का समूह है जो हवा की थैलियों के बीच के ऊतक को प्रभावित करती हैं। एक्स-रे पर ये एक-सी दिखती हैं, पर इनका इलाज बहुत अलग होता है — कुछ में प्रतिरोधक क्षमता दबाने वाली दवाएँ, कुछ में एंटीफ़ाइब्रोटिक, और कुछ में केवल कारण हटाना ही पर्याप्त है।
यह होता क्या है
हवा की थैलियों के बीच एक पतली संरचना होती है जिससे ऑक्सीजन रक्त में जाती है। ILD में यह सूज जाती है, मोटी होती है और अंततः निशान में बदल जाती है। फेफड़े कठोर और छोटे हो जाते हैं, ऑक्सीजन का स्थानांतरण घट जाता है।
कुछ ILD मुख्यतः सूजन वाली होती हैं और दवाओं से अच्छा सुधार दिखाती हैं; कुछ मुख्यतः निशान वाली (फ़ाइब्रोटिक) होती हैं।
प्रमुख प्रकार
- इडियोपैथिक पल्मोनरी फ़ाइब्रोसिस
- हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस — पक्षियों, फफूँद, नमी या ह्यूमिडिफ़ायर से एलर्जी। भारत में बहुत प्रासंगिक और कारण हटाने पर अक्सर सुधार योग्य
- ऑटोइम्यून रोगों से जुड़ी ILD — गठिया, स्क्लेरोडर्मा, स्जोग्रेन, मायोसाइटिस, ल्यूपस
- सारकॉइडोसिस
- कार्यस्थल जनित — सिलिकोसिस, एस्बेस्टॉसिस
- दवाओं से होने वाली ILD
- धूम्रपान से जुड़ी तथा संक्रमण/कोविड के बाद की फ़ाइब्रोसिस
लक्षण
मेहनत पर बढ़ती साँस की तकलीफ़; लगातार सूखी खाँसी; थकान; वज़न घटना; फेफड़ों के निचले भाग में बारीक़ आवाज़; कुछ प्रकारों में उँगलियों का फूलना; उन्नत अवस्था में चलने पर ऑक्सीजन गिरना।
जोड़ों में दर्द, त्वचा का कड़ा होना, आँख-मुँह का सूखापन, ठंड में उँगलियों का रंग बदलना, मांसपेशियों की कमज़ोरी या चकत्ते — ये महत्वपूर्ण संकेत हैं, अवश्य बताएँ।
जाँच
- विस्तृत एक्सपोज़र एवं व्यवसाय इतिहास — यह सबसे उपयोगी हिस्सा है। घर या आसपास पक्षी, दीवारों में नमी या फफूँद, एसी/कूलर, चूल्हे का धुआँ, पत्थर कटाई, निर्माण कार्य, खनन, खेती, तथा वर्तमान व पुरानी सभी दवाएँ।
- HRCT — केंद्रीय जाँच।
- DLCO सहित फेफड़ों की पूरी जाँच, छह-मिनट वॉक टेस्ट।
- ऑटोइम्यून रक्त जाँच, आवश्यक होने पर ब्रोंकोस्कोपी या सर्जिकल बायोप्सी, तथा इकोकार्डियोग्राफी।
उपचार
कारण हटाना सबसे निर्णायक है — पक्षी हटाना, नमी ठीक करना, दोषी दवा बंद करना, कार्यस्थल बदलना। हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस में केवल इतने से ही बड़ा सुधार हो सकता है।
स्टेरॉयड एवं इम्यूनोसप्रेसेंट सूजन वाली ILD में; एंटीफ़ाइब्रोटिक बढ़ती फ़ाइब्रोसिस में; ऑक्सीजन का मूल्यांकन; पल्मोनरी रिहैबिलिटेशन; एसिडिटी का इलाज एवं टीकाकरण; उपयुक्त मरीज़ों में ट्रांसप्लांट रेफ़रल; तथा हर 3–6 माह में नियमित निगरानी।
कब मिलें
आठ सप्ताह से अधिक सूखी खाँसी व बढ़ती साँस की तकलीफ़, जाँच रिपोर्ट में "फ़ाइब्रोसिस/ग्राउंड-ग्लास/ILD", ऑटोइम्यून रोग के साथ साँस फूलना, घर में पक्षी या नमी, पत्थर-धूल का काम, या कोविड के महीनों बाद भी साँस फूलना — इनमें अपॉइंटमेंट बुक करें। पुरानी सीटी और दवाओं की पूरी सूची साथ लाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या ILD और पल्मोनरी फ़ाइब्रोसिस एक ही हैं?
बिल्कुल नहीं। ILD सौ से अधिक बीमारियों का समूह है। फ़ाइब्रोसिस का अर्थ निशान बनना है, जो इनमें से कुछ का अंतिम परिणाम है। कई ILD सूजन वाली होती हैं और दवाओं से अच्छा सुधार दिखाती हैं — इसीलिए सही उपप्रकार पहचानना ज़रूरी है।
क्या ILD ठीक हो सकती है?
यह प्रकार पर निर्भर है। हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस और सारकॉइडोसिस जैसी सूजन वाली ILD में काफ़ी, कभी-कभी पूरी तरह सुधार हो सकता है — विशेषकर जब कारण पहचानकर हटा दिया जाए। बन चुके निशान वापस नहीं होते, पर उनकी गति धीमी की जा सकती है।
डॉक्टर बार-बार पक्षियों और घर की नमी के बारे में क्यों पूछते हैं?
क्योंकि हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस सबसे आम ILD में से एक है और उन गिनी-चुनी बीमारियों में है जिनका कारण हटाया जा सकता है। कबूतर व अन्य पक्षी, दीवारों की फफूँद, गंदे कूलर/ह्यूमिडिफ़ायर और गीला भूसा इसके प्रमुख कारण हैं।
क्या बायोप्सी ज़रूरी है?
प्रायः नहीं। अधिकांश मरीज़ों में सावधानीपूर्वक लिया गया इतिहास, HRCT का स्वरूप और रक्त जाँच मिलकर निदान के लिए पर्याप्त होते हैं। बायोप्सी केवल तब की जाती है जब निदान अनिश्चित हो और परिणाम से इलाज बदलने वाला हो।
जाँच कितनी बार करानी होगी?
फेफड़ों की कार्यक्षमता की जाँच प्रायः हर 3–6 माह में, क्योंकि यह लक्षण बदलने से पहले ही बदलाव पकड़ लेती है। HRCT कम बार दोहराई जाती है — प्रायः स्थिति बदलने पर या कोई बड़ा उपचार निर्णय लेने से पहले।

