
टीबी क्लिनिक में सबसे अधिक पूछा जाने वाला सवाल खाने का ही होता है। और यहीं सबसे अधिक आत्मविश्वास से दी गई, सबसे कम भरोसेमंद सलाह चलती है — कौन-सा फल खाएँ, क्या बिल्कुल न खाएँ, तरह-तरह के नियम।
काम की बात लोकोक्तियों से सरल है, और उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण।
यह जितना लगता है, उससे अधिक मायने क्यों रखता है
टीबी और कुपोषण एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। वज़न कम होने से छिपा संक्रमण सक्रिय रोग में बदलने का खतरा काफ़ी बढ़ जाता है। फिर सक्रिय टीबी भूख घटाकर और शरीर में सूजन पैदा करके वज़न और घटाती है।
भारत में आबादी के स्तर पर टीबी का सबसे बड़ा कारण कुपोषण है। इलाज शुरू करते समय वज़न कम होना धीमी रिकवरी, दवाओं के अधिक दुष्प्रभाव, अधिक मृत्यु दर और ठीक होने के बाद रोग लौटने के अधिक खतरे से जुड़ा है।
झारखंड में हुए एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि टीबी रोगियों के घरवालों को पोषण सहायता देने से उनमें टीबी होने की संख्या उल्लेखनीय रूप से घटी। इसीलिए भारत का अपना कार्यक्रम इलाज के दौरान पोषण के लिए मासिक सहायता राशि देता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि खाना टीबी का इलाज है। इलाज दवाएँ करती हैं। खाना यह तय करता है कि आप दवाएँ कितनी अच्छी तरह सह पाएँगे और कितनी पूरी तरह ठीक होंगे।
असल में क्या खाएँ
पर्याप्त मात्रा। यही पूरी बात है, और यही सबसे कठिन — क्योंकि टीबी ठीक उसी समय भूख घटाती है जब ज़रूरत बढ़ी होती है। इलाज के दौरान आवश्यकता सामान्य से अधिक होती है, कम नहीं।
पूरी थाली संभव न हो तो थोड़ा-थोड़ा, बार-बार खाएँ — तीन के बजाय पाँच-छह बार। आधी छोड़ी हुई बड़ी थाली से पूरी खाई हुई छोटी थाली बेहतर है।
हर भोजन में प्रोटीन। घटी हुई मांसपेशी बनाने के लिए यह ज़रूरी है। स्रोत: दाल और अन्य दलहन, राजमा, चना, पनीर, दही, दूध, अंडे, सोया, मूँगफली। दाल के साथ चावल या राजमा के साथ रोटी — अनाज और दाल साथ खाने से प्रोटीन की गुणवत्ता बढ़ जाती है।
साथ में ऊर्जा। पर्याप्त कैलोरी न मिले तो प्रोटीन शरीर बनाने के बजाय ईंधन की तरह जल जाता है। घी, तेल, मेवे, गुड़ और पूरा दूध कम भूख में ऊर्जा बढ़ाने का सबसे सस्ता तरीका हैं।
सब्ज़ियाँ और फल। हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, गाजर, कद्दू, पपीता, केला और मौसमी फल — जो भी सुलभ और सस्ता हो।
आयरन, क्योंकि खून की कमी आम है और इससे थकान तथा सांस फूलना बढ़ता है। हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ, दलहन, गुड़; साथ में नींबू या आँवला लेने से आयरन बेहतर अवशोषित होता है।
विटामिन डी। भारत में इसकी कमी बहुत आम है और टीबी के बिगड़े परिणामों से जुड़ी है। धूप लें, और डॉक्टर कमी बताए तो पूरक लें।
एक उचित दिन: सुबह दूध के साथ कुछ; दोपहर में दाल, चावल या रोटी, सब्ज़ी और दही; दोपहर बाद मेवे, मूँगफली या फल; शाम को वैसा ही भोजन; रात में दूध। सहन हो तो घी मिलाएँ।
दवाओं के साथ क्या ध्यान रखें
आइसोनियाज़िड विटामिन B6 घटाती है, जिससे हाथ-पैर में झुनझुनी या सुन्नपन हो सकता है। इसीलिए साथ में पाइरिडोक्सिन दी जाती है — वह टीबी की दवा न होते हुए भी ज़रूर लें।
रिफ़ैम्पिसिन खाली पेट बेहतर काम करती है, आमतौर पर खाने से एक घंटा पहले। उल्टी जैसा लगे तो बताएँ, दवा स्वयं बंद न करें।
रिफ़ैम्पिसिन से पेशाब, आँसू और पसीना नारंगी हो जाते हैं। यह अपेक्षित और हानिरहित है। इससे सॉफ़्ट कॉन्टैक्ट लेंस पर स्थायी दाग पड़ जाता है।
शराब पूरी तरह बंद। टीबी की दवाएँ लिवर से होकर गुज़रती हैं और शराब से दवा-जनित हेपेटाइटिस का खतरा बहुत बढ़ जाता है — इलाज रुकने का सबसे आम कारण यही है।
तंबाकू भी बंद। धूम्रपान परिणाम बिगाड़ता है और रोग लौटने का खतरा बढ़ाता है।
तुरंत बताएँ: आँखों या त्वचा का पीलापन, लगातार उल्टी, पेट में तेज़ दर्द, गहरे रंग का पेशाब, या नज़र में बदलाव।
जो सच नहीं है
कोई भोजन टीबी ठीक नहीं करता, और न ही किसी भोजन से कोर्स छोटा होता है। इलाज की अवधि बैक्टीरिया तय करता है, खाना नहीं।
"ठंडा-गरम" के आधार पर कुछ भी छोड़ने की ज़रूरत नहीं। दही, चावल, केला — ये पूरी तरह ठीक हैं और प्रायः वही चीज़ें हैं जो कम भूख में भी खाई जाती हैं। इन्हें हटाने से कुपोषण बढ़ता है।
मांसाहार ज़रूरी नहीं। दाल, दूध-दही और अंडों वाला शाकाहारी भोजन आवश्यकता पूरी कर देता है।
महँगे सप्लीमेंट की ज़रूरत नहीं। पर्याप्त मात्रा में साधारण भोजन प्रोटीन पाउडर से अधिक करता है, और पैसा दूध, अंडे और दाल पर बेहतर खर्च होता है।
अगर मधुमेह (शुगर) भी है
भारत में यह संयोजन बहुत आम है और इससे सलाह बदल जाती है, इसलिए इसे अलग से कहना ज़रूरी है।
मधुमेह से सक्रिय टीबी होने का खतरा लगभग तीन गुना बढ़ जाता है, और टीबी से शुगर नियंत्रित करना कठिन हो जाता है। इलाज के शुरुआती हफ़्तों में शुगर प्रायः बढ़ी रहती है और संक्रमण काबू में आने पर धीरे-धीरे संभलती है।
जो गलती नहीं करनी है: वज़न बढ़ाने के लिए शुगर का नियंत्रण छोड़ देना। मिठाई, अधिक गुड़, मीठे पेय और अधिक मैदा-चावल से वज़न बढ़ेगा पर मधुमेह बिगड़ेगा, और उससे टीबी बिगड़ेगी। वज़न बढ़ाने का बेहतर रास्ता चीनी नहीं, प्रोटीन और वसा है: पनीर, दही, अंडे, दाल, मेवे, मूँगफली, घी और तेल — साथ में साबुत अनाज, और दिन में पाँच-छह बार थोड़ा-थोड़ा।
एक ज़रूरी बात: रिफ़ैम्पिसिन शुगर की कई गोलियों का असर घटा देती है, इसलिए इलाज के दौरान खुराक बदलनी पड़ सकती है और इलाज खत्म होने पर फिर बदलनी पड़ती है। खुराक स्वयं न बदलें। पूरे कोर्स में शुगर की जाँच आम दिनों से अधिक बार करवाएँ।
खाना मुश्किल लगे तो
शुरुआती हफ़्तों में उबकाई आम है। डॉक्टर की सलाह से दवा का समय बदलने से प्रायः राहत मिलती है। ठंडा या सामान्य तापमान का खाना कम गंध करता है और आसानी से खाया जाता है। भोजन के बीच में पानी कम पिएँ, बीच-बीच में अधिक।
इलाज के पहले महीने के बाद भी वज़न घट रहा हो तो अगली विज़िट पर अवश्य बताएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
टीबी के मरीज़ को क्या नहीं खाना चाहिए?
शराब और तंबाकू — बिना किसी अपवाद के। बाक़ी किसी भोजन की मनाही नहीं है। "ठंडा-गरम" के आधार पर दही, चावल या केला छोड़ना नुकसानदेह है, क्योंकि कम भूख में यही चीज़ें खाई जाती हैं।
अच्छा खाने से इलाज की अवधि घट जाएगी?
नहीं। कोर्स की लंबाई दवाओं और बैक्टीरिया से तय होती है। अच्छा पोषण यह तय करता है कि आप दवाएँ कितनी अच्छी तरह सहेंगे और कितनी पूरी तरह ठीक होंगे।
मांसाहार ज़रूरी है?
नहीं। दाल, दूध-दही, अंडे, सोया और मेवे आवश्यकता पूरी कर देते हैं।
पेशाब नारंगी क्यों हो गया?
रिफ़ैम्पिसिन से — आँसू और पसीना भी। यह अपेक्षित और हानिरहित है। दवा बंद करने का कारण नहीं, पर सॉफ़्ट कॉन्टैक्ट लेंस पर दाग पड़ सकता है।
खाने के बावजूद वज़न घट रहा है। क्या करें?
अगली विज़िट का इंतज़ार किए बिना डॉक्टर को बताएँ। पहले महीने के बाद भी वज़न घटना जाँचने योग्य है।
